✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।
ज्येष्ठ मास अर्थात अधिक मास हिन्दू पंचांग का वह अनोखा और दुर्लभ माह है जो लगभग ढाई वर्ष में एक बार आता है और इस वर्ष 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास 59 दिनों की विशेष अवधि के रूप में आ रहा है। यह माह चंद्र और सौर कैलेंडर के बीच के अंतर को संतुलित करने के लिए जोड़ा गया अतिरिक्त चंद्र मास है, जिसमें किए गए दान, जप, तप और पूजा का फल सामान्य मास की तुलना में अनेक गुना बढ़ जाता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम ज्येष्ठ अधिक मास 2026 की तिथियों, धार्मिक-आध्यात्मिक-ज्योतिषीय महत्व, चंद्र पुराण से जुड़ी पौराणिक कथा, 32 दिनों के विशेष उपाय, मंत्र, फायदे और सावधानियों पर गहराई से चर्चा करेंगे।
विषय सूची (Table of Contents)
- अधिक मास क्या है — परिचय
- ज्येष्ठ अधिक मास 2026 — तिथि और अवधि
- अधिक मास का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
- चंद्र पुराण से जुड़ी पौराणिक कथा — दक्ष शाप और चंद्रमा के 16 कला
- अधिक मास में कौन से कार्य करें और कौन से टालें
- 32 दिन के विशेष उपाय और पूजा प्रोटोकॉल
- अधिक मास के शुभ मंत्र — विष्णु, शिव और लक्ष्मी मंत्र
- अधिक मास के 7 प्रमुख फायदे
- सावधानियां और नियम
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अधिक मास क्या है — परिचय
अधिक मास (जिसे मलमास, पुरुषोत्तम मास या लंबे मास के नाम से भी जाना जाता है) हिन्दू वैदिक पंचांग का वह अतिरिक्त चंद्र मास है जो चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच के अंतर को पूरा करने के लिए जोड़ा जाता है। चंद्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा लगभग 29.5 दिनों में पूरी करता है, जिससे 12 चंद्र मास कुल 354 दिनों के होते हैं, जबकि सौर वर्ष 365.25 दिनों का होता है। यह 11 दिनों का अंतर प्रत्येक वर्ष बढ़ता जाता है और लगभग 32 महीनों (करीब 2 वर्ष 8 महीने) में एक पूरे अतिरिक्त माह के रूप में संचित हो जाता है। उसी समय पंचांग में एक अतिरिक्त मास जोड़ दिया जाता है, जिसे "अधिक मास" कहते हैं।
अधिक मास की मुख्य विशेषताएं:
- बारंबारता: लगभग प्रत्येक 32 महीने में एक बार — अर्थात सामान्य जीवन में किसी व्यक्ति को अपने जीवनकाल में 30 से 35 बार अधिक मास देखने को मिलते हैं।
- नाम: अधिक मास, मल मास, पुरुषोत्तम मास — तीनों एक ही अवधि के सूचक हैं।
- सूर्य की स्थिति: जिस राशि में सूर्य पूरे माह भ्रमण नहीं करता, उसी राशि के नाम से उस अधिक मास का नामकरण होता है। 2026 में सूर्य ज्येष्ठ राशि में प्रवेश नहीं करेगा, इसलिए इसे "ज्येष्ठ अधिक मास" कहा जाएगा।
- अवधि: एक अधिक मास की अवधि सामान्य मास की तरह 29-30 दिन नहीं, बल्कि यह 59 दिनों की होती है, क्योंकि इसमें दो शुक्ल पक्ष और दो कृष्ण पक्ष — कुल चार पक्ष होते हैं।
- प्रभुत्व: शास्त्रों के अनुसार इस मास का स्वामी भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) हैं, इसलिए इसे "पुरुषोत्तम मास" भी कहा जाता है। इस मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष विधान है।
2026 के संदर्भ में: 2026 ई. में ज्येष्ठ अधिक मास आ रहा है जो हिन्दू पंचांग की दृष्टि से अत्यंत शुभ अवधि मानी जाता है। पिछला अधिक मास 2023 में (श्रावण अधिक मास) आया था और अब 2026 में यह दोबारा आ रहा है।
ज्येष्ठ अधिक मास 2026 — तिथि और अवधि
ज्येष्ठ अधिक मास 2026 की शुरुआत वैशाख शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होगी और यह ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक रहेगा।
| अवधि | तिथि और समय |
|---|---|
| ज्येष्ठ अधिक मास प्रारंभ | वैशाख शुक्ल प्रतिपदा — मई 2026 के दूसरे सप्ताह में |
| ज्येष्ठ अधिक मास समाप्ति | ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या — जुलाई 2026 के तीसरे सप्ताह तक |
| कुल अवधि | लगभग 59 दिन |
| कुल पक्ष | 2 शुक्ल पक्ष + 2 कृष्ण पक्ष = 4 पक्ष |
| शुक्ल पक्ष प्रथम | प्रतिपदा से पूर्णिमा तक (लगभग 30 दिन) |
| कृष्ण पक्ष प्रथम | प्रतिपदा से अमावस्या तक (लगभग 29 दिन) |
| मुख्य पूजा दिवस | प्रत्येक शुक्ल पक्ष की एकादशी, द्वादशी, पूर्णिमा |
| सोमवार व्रत विशेष | प्रत्येक सोमवार — भगवान शिव पूजा |
| गुरुवार व्रत विशेष | प्रत्येक गुरुवार — भगवान विष्णु पूजा |
| विष्णु पूजा का सर्वोत्तम दिन | प्रथम शुक्ल पक्ष की एकादशी |
विशेष बात: चूंकि इस मास में सूर्य ज्येष्ठ राशि में प्रवेश नहीं करेगा, इसलिए ग्रहों की चाल के अनुसार ज्योतिषीय गणना में विशेष सावधानी रखनी होती है। गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी के अनुसार ज्येष्ठ अधिक मास 2026 का प्रभाव विशेष रूप से वृष, मिथुन, कर्क और सिंह राशि वालों पर अधिक पड़ेगा।
अधिक मास का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
अधिक मास केवल पंचांग की गणना नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व छिपा है। शास्त्रों में इसे "मल मास" यानी अशुद्ध मास कहा गया है जहां कुछ शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं, लेकिन इसी मास में किए गए दान, जप और तप का फल सामान्य मास से अनेक गुना अधिक होता है।
धार्मिक दृष्टि से:
- पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और दान का विशेष फल मिलता है
- इस मास में किए गए तीर्थ स्नान, दान, जप, होम आदि का पुण्य सामान्य मास से 100 गुना अधिक माना जाता है
- वैष्णव संप्रदाय में इस मास को सर्वाधिक पवित्र माना गया है — इसमें विष्णु सहस्रनाम का पाठ, नारायण कवच का जाप सर्वोत्तम फल देता है
- सनातन परंपरा में इसे "मल मास" कहकर कुछ लोग शुभ कार्य टाल देते हैं, लेकिन स्मार्त सिद्धांत के अनुसार इस मास में भी शुभ कार्य किए जा सकते हैं
- भागवत पुराण के अनुसार इस मास में केवल हरि (विष्णु) का स्मरण ही सबसे बड़ा पुण्य है
आध्यात्मिक दृष्टि से:
- चंद्रमा मन का कारक है और अधिक मास में चंद्रमा की 16 कलाओं का विशेष प्रभाव मानसिक स्थिति पर पड़ता है
- इस मास में सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य और मौन का विशेष फल मिलता है
- ध्यान, योग और प्राणायाम इस मास में अधिक प्रभावी होते हैं
- कुंडली में चंद्र दोष, मानसिक तनाव और भावनात्मक अस्थिरता वाले जातकों के लिए यह मास आध्यात्मिक उन्नति का सर्वोत्तम अवसर है
- भक्ति साधना, कीर्तन, सत्संग और प्रवचन इस मास में विशेष फलदायी होते हैं
ज्योतिषीय दृष्टि से:
- कुंडली में चंद्रमा कमजोर, पीड़ित या नीच का हो तो अधिक मास में चंद्र पूजा, मंत्र जाप और श्वेत वस्त्र दान से राहत मिलती है
- कुंडली में पितृ दोष (पितृ दोष, कालसर्प दोष, नागदोष) हो तो अधिक मास में श्राद्ध, तर्पण और पितृ पूजा का अतिरिक्त फल मिलता है
- ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में बाधा, अनिष्ट या क्लेश हो तो इस मास में रुद्राक्ष धारण, महामृत्युंजय जाप और शिव पूजा लाभकारी
- शनि की साढ़े साती या ढैय्या चल रही हो तो अधिक मास में शनिवार को तिल-तेल दान और हनुमान चालीसा का पाठ विशेष शांति देता है
- कुंडली में विवाह में बाधा, संतान विलंब, व्यापार में हानि जैसी समस्याओं के लिए अधिक मास में विष्णु पूजा, लक्ष्मी पूजा और कुबेर पूजा अत्यंत प्रभावी
चंद्र पुराण से जुड़ी पौराणिक कथा — दक्ष शाप और चंद्रमा के 16 कला
अधिक मास की उत्पत्ति और महत्व समझने के लिए हमें चंद्र पुराण की एक अत्यंत रोचक कथा को समझना होगा, जो इस मास के धार्मिक आधार की कुंजी है।
प्राचीन काल में प्रजापति दक्ष की पुत्री का नाम "अदिति" नहीं, बल्कि उनकी अन्य पुत्री थीं जिनमें से एक का नाम "पृथ्वी" था। कथा के अनुसार पृथ्वी ने चंद्रमा से विवाह किया। चंद्रमा अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और 16 कलाओं से परिपूर्ण थे। चंद्रमा ने पृथ्वी से विवाह के बाद अपनी कांति और सौंदर्य का अहंकार कर लिया और अन्य देवताओं तथा ऋषियों के प्रति अभद्र व्यवहार करने लगे। उन्होंने देवताओं और ब्राह्मणों का अपमान किया तथा अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे।
इस अहंकार से कुपित होकर प्रजापति दक्ष ने चंद्रमा को श्राप दिया कि "तुम्हारी 16 कलाओं में से एक-एक करके क्षीण होती जाएगी और तुम क्षीण चंद्रमा (अमावस्या के चंद्रमा) के रूप में तप करोगे।" इस शाप से चंद्रमा अत्यंत दुखी हुए और उनकी कांति क्षीण होने लगी। उनकी पत्नी पृथ्वी और पुत्र वृक्ष, औषधियां सभी दुखी हो गए, क्योंकि चंद्र की कलाओं के क्षीण होने से पृथ्वी पर वनस्पति, जल और जीवन शक्ति घटने लगी।
तब देवताओं ने चंद्रमा को उपाय बताया कि "भगवान विष्णु की आराधना करो।" चंद्रमा ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की और उनकी 16 कलाएं एक-एक करके वापस लौटने लगीं। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर चंद्रमा को वरदान दिया कि "जब तुम अमावस्या के बाद पूर्णिमा तक 16 कलाओं को पुनः प्राप्त करोगे, तब तुम्हारे नाम से एक अतिरिक्त मास (पुरुषोत्तम मास) जोड़ा जाएगा।" उसी पुरुषोत्तम मास में जो व्यक्ति हरि (विष्णु) का स्मरण करेगा, जप करेगा और दान देगा, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी।
कथा का संदेश:
- अहंकार का विनाश निश्चित है — चाहे वह कितना भी तेजस्वी क्यों न हो
- तपस्या और भक्ति से कोई भी असंभव कार्य संभव हो सकता है
- चंद्रमा की क्षीण कलाएं ही अधिक मास के रूप में लौटती हैं — अर्थात हमारे पाप, कर्म और अहंकार भी तप से शुद्ध हो सकते हैं
- भगवान विष्णु की कृपा से चंद्रमा को 16 कलाएं वापस मिलीं, इसलिए इस मास में विष्णु पूजा सर्वोत्तम है
- पृथ्वी पर जीवन की रक्षा के लिए चंद्रमा का शुद्ध होना आवश्यक है — इसीलिए अधिक मास में हमारे मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धिकरण का विधान है
अधिक मास में कौन से कार्य करें और कौन से टालें
अधिक मास को लेकर स्मार्त और वैष्णव परंपरा में कुछ भिन्न मत हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से निम्न कार्यों का पालन सर्वोत्तम फल देता है:
अधिक मास में करने योग्य कार्य (शुभ):
- तप और व्रत — एकादशी व्रत, प्रदोष व्रत, शनिवार व्रत, सोमवार व्रत
- जप — विष्णु सहस्रनाम, नारायण मंत्र, हरि ओम, महामृत्युंजय मंत्र का जाप
- दान — तिल, गुड़, सफेद वस्त्र, चंदन, श्वेत पदार्थ, गाय को हरा चारा, जल में दूध मिलाकर दान
- पूजा — भगवान विष्णु की पूजा, सात्विक भोजन के साथ
- तीर्थ स्नान — गंगा स्नान, यमुना स्नान या घर में गंगाजल से स्नान
- सेवा — ब्राह्मण भोजन, गरीबों को भोजन, वृद्धाश्रम में सेवा
- सत्संग — भागवत कथा, रामायण पाठ, गीता का नियमित अध्ययन
- रुद्राक्ष धारण — 108 माला रुद्राक्ष, 11 मुखी रुद्राक्ष या गोमेद रत्न धारण
- वास्तु शुद्धि — घर में गंगाजल छिड़कना, पूजा स्थान की सफाई
- मानसिक साधना — ध्यान, योग, प्राणायाम का नियमित अभ्यास
अधिक मास में टालने योग्य कार्य (अशुभ):
- मांगलिक कार्य — विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नामकरण, अन्नप्राशन
- भूमि/भवन संबंधी कार्य — नई जमीन खरीदना, नया घर बनाना शुरू करना
- दीक्षा संस्कार — यज्ञोपवित, कुंडा, ब्रह्मचर्य व्रत की दीक्षा
- व्यापारिक शुभारंभ — नया व्यापार, नई दुकान का उद्घाटन
- रथयात्रा, जुलूस, मेला — इनकी भी मनाही कुछ पंचांगों में है
- सर्जरी/शल्य क्रिया — यदि जरूरी न हो तो टालें (वैद्य राय के अनुसार)
- तामसिक भोजन — मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का त्याग
- झूठ, छल, क्रोध — इनका त्याग अनिवार्य है
विशेष सूचना: गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी के अनुसार, अधिक मास में केवल विष्णु भक्ति का विशेष महत्व है — ऐसा मानने वाले वैष्णव संप्रदाय के लोग अधिक मास में केवल हरि नाम का स्मरण करते हैं और बाकी सभी कर्म त्याग देते हैं। स्मार्त परंपरा में भी यह मास दान, जप और तप के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
32 दिन के विशेष उपाय और पूजा प्रोटोकॉल
अधिक मास के दो शुक्ल पक्षों को मिलाकर कुल 32 शुभ दिन होते हैं (प्रत्येक शुक्ल पक्ष में 15-16 दिन)। प्रत्येक दिन एक विशेष उपाय या पूजा प्रोटोकॉल का विधान है। नीचे एक सुव्यवस्थित 32-दिवसीय उपाय योजना दी जा रही है जिसका पालन करके आप अधिक मास का अधिकतम फल प्राप्त कर सकते हैं:
प्रथम शुक्ल पक्ष (दिन 1-15):
- दिन 1 — प्रतिपदा: भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें और कलश स्थापना करें
- दिन 2 — द्वितीया: अक्षत (अखंड) चावल का दान करें
- दिन 3 — तृतीया: पीले वस्त्र और हल्दी का दान
- दिन 4 — चतुर्थी: नारायण कवच का पाठ शुरू करें
- दिन 5 — पंचमी: गाय को हरा चारा खिलाएं
- दिन 6 — षष्ठी: भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें
- दिन 7 — सप्तमी: 108 बार "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप
- दिन 8 — अष्टमी: गरीब ब्राह्मण को भोजन कराएं
- दिन 9 — नवमी: श्वेत वस्त्र और दूध का दान
- दिन 10 — दशमी: विष्णु सहस्रनाम का पाठ
- दिन 11 — एकादशी: वैकुण्ठ एकादशी व्रत (सर्वोत्तम)
- दिन 12 — द्वादशी: दामोदर व्रत और भगवान विष्णु का पूजन
- दिन 13 — त्रयोदशी: चंदन और कपूर का दान
- दिन 14 — चतुर्दशी: दीपदान और तिल के तेल का दान
- दिन 15 — पूर्णिमा: भगवान विष्णु की विशेष पूजा, रात्रि जागरण
द्वितीय शुक्ल पक्ष (दिन 16-30):
- दिन 16 — प्रतिपदा: नवीन मंत्र जाप शुरू करें
- दिन 17 — द्वितीया: पीतल के बर्तन का दान
- दिन 18 — तृतीया: भगवान शिव और विष्णु की संयुक्त पूजा
- दिन 19 — चतुर्थी: गीता के 7वें अध्याय का पाठ
- दिन 20 — पंचमी: गाय के गोबर से घर की शुद्धि
- दिन 21 — षष्ठी: कन्या पूजन (लक्ष्मी रूप)
- दिन 22 — सप्तमी: शालिग्राम शिला का पूजन
- दिन 23 — अष्टमी: 11 मुखी रुद्राक्ष का दान
- दिन 24 — नवमी: माँ लक्ष्मी की विशेष पूजा
- दिन 25 — दशमी: महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप
- दिन 26 — एकादशी: दूसरी एकादशी व्रत
- दिन 27 — द्वादशी: भगवान नृसिंह की पूजा
- दिन 28 — त्रयोदशी: गरीब कन्याओं को उपहार
- दिन 29 — चतुर्दशी: दीपोत्सव — घर में 21 दीपक जलाएं
- दिन 30 — पूर्णिमा: कन्या भोजन और विष्णु पूजा
नोट: कुछ पंचांगों के अनुसार अधिक मास में दो शुक्ल पक्षों की दो पूर्णिमाएं आती हैं। दोनों पूर्णिमाओं पर विशेष स्नान, दान और पूजा का विधान है। ये दोनों पूर्णिमाएं "अधिक मास की पूर्णिमा" कहलाती हैं और इनमें गंगा स्नान का अक्षय फल मिलता है।
अधिक मास के शुभ मंत्र — विष्णु, शिव और लक्ष्मी मंत्र
अधिक मास के दौरान निम्न मंत्रों का जाप विशेष फलदायी माना गया है। प्रत्येक मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। यदि संभव हो तो माला पर 11 बार या 21 बार 108 की गिनती पूरी करें।
भगवान विष्णु मंत्र (मुख्य):
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (108 बार सवेरे)
- ॐ विष्णवे नमः (21 माला)
- ॐ नारायणाय नमः (108 बार)
- ॐ पुरुषोत्तमाय नमः (अधिक मास विशेष मंत्र)
- ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ग्लौं श्री महालक्ष्म्यै नमः
विष्णु सहस्रनाम (संपूर्ण पाठ):
- प्रतिदिन संपूर्ण विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
- एक माला पर 108 नामों का जाप करते हुए 10 माला पूरी करें
- यह अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है
भगवान शिव मंत्र (अधिक मास में शिव पूजा भी शुभ):
- ॐ नमः शिवाय (108 बार)
- ॐ ह्रौं जूं सः शिवाय नमः
- ॐ त्र्यम्बकं यजामहे — महामृत्युंजय मंत्र (108 बार)
माँ लक्ष्मी मंत्र (धन और समृद्धि के लिए):
- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं
- ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः
जाप की विधि:
- ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) में जाप सर्वोत्तम
- प्रदोष काल (शाम को सूर्यास्त के बाद) में भी जाप शुभ
- जाप के पहले स्नान करें, शुद्ध वस्त्र पहनें और संकल्प लें
- माला रुद्राक्ष या तुलसी की हो तो अधिक शुभ
- जाप के समय मन में केवल ईश्वर का ध्यान रखें
अधिक मास के 7 प्रमुख फायदे
गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी के 15 वर्षों के अनुभव और शास्त्रों के अध्ययन के आधार पर अधिक मास में किए गए उपायों के 7 प्रमुख फायदे हैं:
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पाप क्षय: अधिक मास में किए गए दान, जप और तप से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय होता है। विशेष रूप से कुंडली में पाप ग्रहों की वजह से आ रही समस्याओं में इस मास का दान अत्यंत लाभकारी है। सामान्य मास में जो दान 1 गुना फल देता है, वही दान अधिक मास में 100 गुना फल देता है।
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मोक्ष की प्राप्ति: भागवत पुराण के अनुसार अधिक मास में केवल हरि नाम का स्मरण करने से भी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। यह मास मृत्यु के बाद अच्छी गति देने वाला माना गया है। जिन व्यक्तियों की कुंडली में मोक्ष कर्म की प्रबल संभावना हो, उनके लिए अधिक मास में भागवत पाठ और रामायण पाठ विशेष लाभकारी है।
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ग्रह दोषों का निवारण: कुंडली में चंद्र दोष, मंगल दोष, शनि दोष, राहु-केतु की पीड़ा, कालसर्प दोष, पितृ दोष जैसे अनेक दोषों का निवारण अधिक मास में संभव है। इस मास में ग्रहों से संबंधित विशेष पूजा (जैसे शनि के लिए शनिवार को तिल-तेल दान, मंगल के लिए मंगलवार को हनुमान पूजा) अत्यंत प्रभावी होती है।
-
संतान सुख और गृह कल्याण: कुंडली में पंचम भाव कमजोर, संतान विलंब या संतान संबंधी समस्या हो तो अधिक मास में पुत्र कामेष्टि यज्ञ, संतान गोपाल मंत्र का जाप और गोविंद भगवान की पूजा अत्यंत लाभकारी। साथ ही गृह कल्याण के लिए विष्णु पूजा, वास्तु शुद्धि और गंगाजल का छिड़काव भी इस मास में अधिक प्रभावी।
-
वैवाहिक जीवन में सुख: अंतर्दशा या दशा में विवाह में बाधा, पति-पत्नी में कलह, वैवाहिक सुख में कमी जैसी समस्याओं के लिए अधिक मास में लक्ष्मी-नारायण पूजा, उमा-महेश्वर पूजा और विवाह मंत्रों का जाप विशेष फलदायी। गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी के अनुसार जिन दंपत्तियों के वैवाहिक जीवन में समस्या हो, वे इस मास में संयुक्त रूप से विष्णु पूजा करें।
-
आर्थिक समृद्धि और व्यापार में वृद्धि: व्यापार में हानि, आर्थिक तंगी, नौकरी में अस्थिरता, कर्ज से मुक्ति जैसी समस्याओं के लिए अधिक मास में कुबेर पूजा, लक्ष्मी पूजा, शुक्रवार को हल्दी-चंदन का दान, पीले वस्त्रों का दान विशेष लाभकारी। कुंडली में द्वितीय भाव या एकादश भाव कमजोर हो तो इस मास का दान अवश्य करें।
-
मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति: अधिक मास में किए गए ध्यान, योग, प्राणायाम, मौन व्रत, सात्विक भोजन से मानसिक शांति मिलती है। तनाव, चिंता, अवसाद, अनिद्रा जैसी समस्याओं में इस मास का अनुष्ठान अत्यंत लाभकारी है। भक्ति मार्ग पर चलने वालों के लिए यह मास साधना की दृष्टि से स्वर्णिम अवसर है।
सावधानियां और नियम
अधिक मास का अधिकतम लाभ उठाने के लिए कुछ आवश्यक सावधानियों का पालन करना चाहिए:
व्यक्तिगत सावधानियां:
- इस मास में शाकाहारी सात्विक भोजन ही ग्रहण करें — मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का त्याग अनिवार्य
- क्रोध, झूठ, छल, कपट का त्याग करें — ये चार अधिक मास के पुण्य को नष्ट कर देते हैं
- ब्रह्मचर्य का पालन करें — विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में यह अनिवार्य माना गया है
- रोजाना स्नान करें और शुद्ध वस्त्र धारण करें
- रात्रि जागरण का विशेष प्रावधान है — जो लोग नहीं जाग सकते वे रात्रि को भगवान का स्मरण करते हुए सोएं
- मौन व्रत (कम से कम एक दिन) रखें
- पशुओं, पक्षियों, कीट-पतंगों को कष्ट न दें
- बड़ों का आशीर्वाद लें और छोटों से प्रेम करें
पारिवारिक सावधानियां:
- घर में शांति और सद्भाव बनाए रखें
- पति-पत्नी के बीच कलह इस मास में अधिक पाप देता है
- बच्चों को इस मास के महत्व के बारे में बताएं
- परिवार के साथ संयुक्त रूप से सत्संग, भजन और पूजा करें
- बुजुर्गों की सेवा करें
- किसी भी सदस्य की अवहेलना न करें
धार्मिक सावधानियां:
- केवल योग्य ब्राह्मण से ही पूजा कराएं — अनपढ़ पंडित की पूजा का फल नहीं मिलता
- पंचांग के अनुसार ही तिथि और मुहूर्त देखें
- दान सही व्यक्ति को ही दें — भिखारी को दान देने से पहले उसकी स्थिति जांचें
- किसी के साथ छल या धोखा न करें
- स्त्री-पुरुष दोनों के लिए अधिक मास में संयम आवश्यक है
- मलमास में तीर्थ स्नान का विशेष फल है, परंतु पंचांग देखकर ही स्नान करें
ज्योतिषीय सावधानियां:
- कुंडली में पितृ दोष हो तो इस मास में पितृ तर्पण अवश्य करें
- कालसर्प दोष हो तो नागदेवता की पूजा करें
- मंगल दोष हो तो मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ
- शनि की साढ़े साती चल रही हो तो शनिवार को पीपल वृक्ष में जल दें
- राहु-केतु की पीड़ा हो तो शनिवार को सुर्खी (लाल चंदन) का दान
- चंद्र दोष हो तो सोमवार को शिवलिंग पर जल चढ़ाएं
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या अधिक मास में विवाह हो सकता है?
शास्त्रों के अनुसार अधिक मास में मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं, जिनमें विवाह प्रमुख है। हालांकि कुछ पंचांगों में कहा गया है कि यदि अधिक मास के शुक्ल पक्ष में शुभ तिथि (दो, तीन, पांच, सात, दस, ग्यारह, बारह, तेरह, पूर्णिमा), शुभ नक्षत्र और शुभ योग हो तो विवाह किया जा सकता है। लेकिन पारंपरिक रूप से अधिक मास में विवाह टालना ही श्रेयस्कर माना गया है।
क्या अधिक मास हर साल आता है?
नहीं, अधिक मास हर साल नहीं आता। यह लगभग 32 महीनों (2 वर्ष 8 महीने) में एक बार आता है। पिछला अधिक मास 2023 में श्रावण अधिक मास के रूप में आया था और अब 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास आ रहा है। अगला अधिक मास 2028 या 2029 में आने की संभावना है।
क्या मलमास में कफ़न यात्रा (अंतिम संस्कार) कर सकते हैं?
शास्त्रों के अनुसार मलमास में कफ़न यात्रा करने में कोई दोष नहीं है। दरअसल, मलमास में किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का पितरों को विशेष फल मिलता है। यदि किसी का देहांत मलमास में हुआ है तो उसके पितरों की विशेष श्रद्धि मानी जाती है। गरुड़ पुराण के अनुसार मलमास में किया गया श्राद्ध अक्षय फल देता है।
अधिक मास में कौन सा दान सबसे अच्छा है?
अधिक मास में सबसे उत्तम दान तिल, जल, गाय को हरा चारा, सफेद वस्त्र, चंदन, श्वेत पदार्थ, गुड़, दूध, घी, शहद और सोने-चांदी का दान है। वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम शिला का दान सर्वोत्तम माना जाता है। जो व्यक्ति आर्थिक रूप से समर्थ नहीं है, वह सात्विक भोजन, जल, या एक मुट्ठी अनाज भी दान कर सकता है — भावना और श्रद्धा मुख्य है।
क्या अधिक मास में मुंडन कराना चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार मुंडन एक शुभ संस्कार है जो मांगलिक कार्यों की श्रेणी में आता है। अधिक मास में मुंडन वर्जित माना गया है। यदि मुंडन अत्यंत आवश्यक हो (जैसे स्वास्थ्य कारण से) तो किसी अच्छे मुहूर्त में कराया जा सकता है, अन्यथा अधिक मास समाप्त होने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए।
क्या अधिक मास में भगवान विष्णु की पूजा सबसे अच्छी है?
हां, अधिक मास को "पुरुषोत्तम मास" कहा जाता है और इसका स्वामी भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) को माना गया है। इस मास में भगवान विष्णु की पूजा, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, नारायण कवच का जाप, भगवान विष्णु के अवतारों (राम, कृष्ण, नृसिंह) की पूजा सर्वोत्तम फल देती है। साथ ही माँ लक्ष्मी, भगवान शिव और भगवान राम की पूजा भी शुभ है, लेकिन विष्णु पूजा का स्थान सर्वोपरि है।
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[ { "question": "क्या अधिक मास में विवाह हो सकता है?", "answer": "शास्त्रों के अनुसार अधिक मास में मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं। पारंपरिक रूप से विवाह अधिक मास के बाद ही करना श्रेयस्कर है।" }, { "question": "क्या अधिक मास हर साल आता है?", "answer": "नहीं, अधिक मास लगभग 32 महीनों (2 वर्ष 8 महीने) में एक बार आता है। 2023 में श्रावण अधिक मास, 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास आ रहा है।" }, { "question": "क्या मलमास में कफ़न यात्रा (अंतिम संस्कार) कर सकते हैं?", "answer": "हां, मलमास में कफ़न यात्रा और श्राद्ध का विशेष फल मिलता है। गरुड़ पुराण के अनुसार मलमास में किया गया श्राद्ध अक्षय फल देता है।" }, { "question": "अधिक मास में कौन सा दान सबसे अच्छा है?", "answer": "तिल, जल, गाय को हरा चारा, सफेद वस्त्र, चंदन, दूध, घी, शहद और शालिग्राम शिला का दान सर्वोत्तम है। भावना और श्रद्धा मुख्य है।" }, { "question": "क्या अधिक मास में मुंडन कराना चाहिए?", "answer": "मुंडन एक मांगलिक संस्कार है जो अधिक मास में वर्जित माना गया है। अत्यंत आवश्यक हो तो शुभ मुहूर्त में कराएं, अन्यथा अधिक मास समाप्त होने तक प्रतीक्षा करें।" }, { "question": "क्या अधिक मास में भगवान विष्णु की पूजा सबसे अच्छी है?", "answer": "हां, अधिक मास को 'पुरुषोत्तम मास' कहते हैं और इसमें भगवान विष्णु की पूजा, विष्णु सहस्रनाम, नारायण कवच का जाप सर्वोत्तम फल देता है।" } ]