✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।
दान हिन्दू धर्म का सबसे प्राचीन और सशक्त कर्मकांड है — जिसे शास्त्रों में "ईश्वर की पूजा से भी बड़ा" कहा गया है। जब कुंडली में कोई ग्रह कमजोर हो, पितृ ऋण भारी हो, या जीवन में बार-बार एक ही समस्या दोहराई दे, तो ज्योतिषी सबसे पहले उचित दान की सलाह देते हैं। यह लेख दान के 18 शास्त्रीय प्रकार, 10 प्रमुख दानों की विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, फायदे और सावधानियों का विस्तृत मार्गदर्शन है।
विषय सूची (Table of Contents)
- दान क्या है — परिचय और अवधारणा
- दान का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
- 18 प्रकार के दान — मनु स्मृति के अनुसार
- 10 प्रमुख दान — विधि और फल
- दान की संपूर्ण विधि — 6 चरण
- कब करें दान — 16 शुभ दिन और मुहूर्त
- किसे दें, क्या न दें — पात्र और अपात्र
- दान के मंत्र — 6 प्रभावी मंत्र
- दान के 8 प्रमुख लाभ
- सावधानियां और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दान क्या है — परिचय और अवधारणा
"दान" शब्द संस्कृत के "दा" धातु से बना है जिसका अर्थ है — देना, समर्पित करना। शास्त्रों में दान की परिभाषा बहुत विस्तृत है — केवल धन देना ही दान नहीं है, बल्कि अन्न, वस्त्र, जल, विद्या, औषधि, आश्रय, अभय और प्रेम — हर वह कार्य जो किसी जरूरतमंद की सेवा में समर्पित हो, वह दान है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह कहते हैं — "दानं हि परमं तपः" अर्थात् दान ही परम तप है। श्रीमद्भागवत पुराण में भी कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक दान करता है, उसके पुण्य की गिनती नहीं हो सकती। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (अध्याय 17, श्लोक 20) में कहा है — "दातव्यमिति यद्दानं" — जो दान देने योग्य समझकर दिया जाता है, वही सात्विक दान है।
दान के तीन मूल तत्व:
- देने वाला (दाता) — जो दान दे
- पात्र — जिसे दान मिले
- वस्तु — जो दी जाए
शास्त्र कहते हैं कि दान तभी फलित होता है जब ये तीनों शुद्ध हों। यदि दाता अहंकार से दे, पात्र अपात्र हो, या वस्तु अनुपयुक्त हो, तो दान का पूर्ण फल नहीं मिलता।
दान का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
दान का महत्व केवल सामाजिक सेवा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तीन गहन आयाम हैं:
1. धार्मिक आयाम:
- वैदिक साहित्य में दान को मोक्ष का सीधा मार्ग बताया गया है
- ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में दान की प्रशंसा में अनेक मंत्र हैं
- मनु स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और पराशर स्मृति में दान के नियम विस्तार से दिए हैं
- सोलह संस्कारों में से अन्नप्राशन और विवाह संस्कार में दान अनिवार्य है
- तीर्थयात्रा के बाद दान को स्नान से भी अधिक पवित्र माना गया है
2. आध्यात्मिक आयाम:
- दान से अहंकार, लोभ और ममत्व का नाश होता है
- देने की भावना से हृदय में करुणा, प्रेम और विनम्रता का विकास होता है
- दान पुण्य का संचय करता है जो जन्म-जन्मांतर साथ देता है
- कर्म सिद्धांत के अनुसार जो दिया जाता है, वह कई गुना लौटकर आता है
- दान से आत्मा का शुद्धिकरण होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है
3. ज्योतिषीय आयाम:
- कुंडली में कमजोर ग्रहों के प्रभाव को दान से कम किया जा सकता है
- राहु-केतु, शनि और मंगल के दोषों में विशिष्ट दान अत्यंत प्रभावी है
- पितृ ऋण और कालसर्प दोष में पिंडदान सहित दान का विशेष विधान है
- शुक्र दोष में विद्यादान, शनि दोष में तिलदान, कुंडली में अनिष्ट योगों को दान से निवारण
- ज्योतिष में "शुभ कर्म" के रूप में दान का विश्लेषण किया जाता है
18 प्रकार के दान — मनु स्मृति के अनुसार
मनु स्मृति के चौथे अध्याय में 18 प्रकार के दानों का उल्लेख है। इनमें से प्रत्येक दान का अपना विशेष फल और पात्र होता है:
- अन्नदान — भूखों को भोजन
- वस्त्रदान — निर्धनों को वस्त्र
- जलदान — प्यासों को जल
- विद्यादान — विद्यार्थियों को शिक्षा
- औषधिदान — रोगियों को दवा
- अभयदान — भयभीत को सुरक्षा
- अग्निदान — यज्ञ के लिए अग्नि
- पात्रदान — बर्तन का दान
- छत्रदान — छाता/छत का दान
- सूपदान — चम्मच/बर्तन का दान
- शय्यादान — बिस्तर/शय्या का दान
- आसनदान — आसन/सीट का दान
- चन्दनदान — चंदन/सुगंध का दान
- दीपदान — दीपक/रोशनी का दान
- पुष्पदान — फूलों का दान
- धूपदान — अगरबत्ती/धूप का दान
- ताम्बूलदान — पान/सुपारी का दान
- सुवर्णदान — सोने/चांदी का दान
इन 18 दानों में से कुछ विशेष दान अत्यंत फलदायी माने जाते हैं, जिनका वर्णन नीचे विस्तार से है।
10 प्रमुख दान — विधि और फल
शास्त्रों में 10 दान ऐसे हैं जिन्हें "महादान" की श्रेणी में रखा गया है। ये प्रत्येक दान विशिष्ट ग्रहों, दोषों और जीवन समस्याओं में अत्यंत प्रभावी हैं:
1. अन्नदान (अन्न = अन्नपूर्णा): अन्नदान को सबसे महान दान माना गया है। कहा जाता है कि "अन्नदान से बड़ा कोई दान नहीं।" किसी भूखे को भोजन कराना सीधे मां अन्नपूर्णा की सेवा के समान है। अन्नदान से कुंडली के द्वितीय भाव (धन भाव) की पुष्टि होती है और भोजन की कमी कभी नहीं होती। शनिवार या मंगलवार को गरीबों को भोजन कराना विशेष फलदायी है।
2. वस्त्रदान: वस्त्रदान से शुक्र ग्रह की कृपा बढ़ती है। शादी में बाधा, जीवनसाथी से अनबन, या कुंडली में शुक्र दोष हो तो वस्त्रदान अवश्य करना चाहिए। सफेद या पीले वस्त्र गरीबों, विद्यार्थियों या ब्राह्मणों को दान करें। अक्टूबर से फरवरी तक वस्त्रदान का विशेष महत्व है।
3. जलदान: जलदान से सूर्य और चंद्रमा दोनों ग्रह प्रसन्न होते हैं। गर्मियों में प्यासे को जल देना, कुएं का निर्माण, पीपल के वृक्ष को जल देना — ये सब जलदान में आते हैं। जलदान से पितृ तृप्ति और रोग मुक्ति दोनों मिलती है। ग्रीष्म ऋतु में जलदान का फल अनंत गुना बढ़ जाता है।
4. गोदान: गोदान को महादानों में से एक माना गया है। गाय को दान करने या गोशाला में गाय की सेवा का दान देना — दोनों गोदान की श्रेणी में आते हैं। गोदान से कुंडली के नवम भाव (भाग्य भाव) की पुष्टि होती है, पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। यह दान सर्वोत्तम माना गया है, लेकिन आजकल गोदान के बदले गोशाला में गाय की सेवा का दान दिया जा सकता है।
5. तिलदान: तिलदान शनि और राहु दोषों में अत्यंत प्रभावी है। काले तिल, सफेद तिल दोनों का दान किया जाता है। शनिवार को काले तिल, शनि मंदिर में तिल, काले वस्त्र और लोहे की वस्तु का दान करना चाहिए। तिलदान से शनि के बुरे प्रभाव कम होते हैं, रोग मुक्ति मिलती है, और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
6. कंबलदान: कंबलदान शीत ऋतु में विशेष फलदायी है। सर्दियों में गरीबों को कंबल, रजाई, स्वेटर आदि का दान करना कंबलदान कहलाता है। इससे शनि और बृहस्पति दोनों प्रसन्न होते हैं। सफेद या ऊनी कंबल का दान विशेष उत्तम है।
7. शय्यादान: शय्यादान से रोग मुक्ति और सुख की नींद मिलती है। बिस्तर, चादर, तकिया, चटाई आदि का दान शय्यादान है। अस्पताल में भर्ती रोगियों को बिस्तर या गरीबों को चटाई दान करना विशेष फलदायी है। वृद्धाश्रम में वृद्धों को शय्या दान करने से पितृ तृप्ति मिलती है।
8. विद्यादान: विद्यादान को सबसे पवित्र दान माना गया है। विद्यार्थियों को शिक्षा, किताबें, स्कूल की फीस, स्टेशनरी आदि का दान विद्यादान है। विद्यादान से कुंडली के पंचम भाव (बुद्धि भाव) की पुष्टि होती है, बुद्धि तेज होती है, और संतान को उच्च शिक्षा मिलती है। बुध और शुक्र दोष में विद्यादान अत्यंत प्रभावी है।
9. औषधिदान: औषधिदान से स्वास्थ्य दोष दूर होते हैं। गरीब रोगियों को दवा, चिकित्सा खर्च, या आयुर्वेदिक औषधि का दान औषधिदान है। धन्वंतरि जयंती और दीपावली के दिन औषधिदान अत्यंत फलदायी माना जाता है। औषधिदान से कुंडली के षष्ठम भाव (रोग भाव) का दोष कम होता है।
10. दीपदान: दीपदान से अंधेरे, अज्ञान और निराशा का नाश होता है। मंदिर में दीपक, गरीबों को मिट्टी का दीपक या दीपावली के अवसर पर दीपक दान करना दीपदान है। दीपदान से कुंडली के अष्टम भाव (अचानक घटनाओं का भाव) की पीड़ा कम होती है। कार्तिक मास में दीपदान का फल अनंत गुना बढ़ जाता है।
दान की संपूर्ण विधि — 6 चरण
दान विधिपूर्वक करना चाहिए, तभी उसका पूर्ण फल मिलता है। यहाँ 6 चरणों में विधि बताई जा रही है:
चरण 1 — संकल्प लें: सुबह स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — "मैं [अपना नाम] इस दिन [पात्र का नाम] को [वस्तु का नाम] का दान कर रहा हूँ, इससे मेरे [ग्रह/पितर/दोष] की शांति हो।"
चरण 2 — पात्र को बुलाएं: शुद्ध आचरण वाले ब्राह्मण, गरीब, अनाथ, विद्यार्थी या जरूरतमंद को बुलाएं। पात्र के चयन में सावधानी रखें — पात्र का स्वभाव और आचरण अच्छा हो।
चरण 3 — वस्तु तैयार करें: दान की वस्तु शुद्ध और नई हो। पुरानी, टूटी-फूटी या अनुपयोगी वस्तु दान न करें। अन्न में शुद्ध अनाज, वस्त्र में नए या साफ वस्त्र होने चाहिए।
चरण 4 — मंत्रोच्चारण: वस्तु देते समय "इदं न मम" अर्थात् "यह मेरा नहीं है" भाव से दें। "ॐ ह्रीं श्रीं" मंत्र बोलकर वस्तु पात्र को सुपुर्द करें।
चरण 5 — समर्पण: वस्तु देते समय अहंकार न रखें। पात्र के चरणों में वस्तु रखें और हाथ जोड़कर "यह मेरा नहीं, ईश्वर का है" ऐसा भाव रखें।
चरण 6 — आशीर्वाद लें: पात्र से आशीर्वाद लें। ब्राह्मण हो तो "ॐ शांतिः शांतिः शांतिः" बोलकर स्वस्ति-वाचन कराएं। दान के बाद थोड़ा समय बैठकर पात्र की कुशलता पूछें।
कब करें दान — 16 शुभ दिन और मुहूर्त
दान किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन कुछ विशेष तिथियों और दिनों पर दान का फल अनेक गुना बढ़ जाता है:
- पूर्णिमा — चंद्रमा की पूर्णता का दिन
- अमावस्या — पितरों के लिए विशेष दिन
- एकादशी — एकादशी व्रत के साथ दान का विशेष फल
- सावन के सोमवार — शिव की पूजा के साथ जलदान
- कार्तिक पूर्णिमा — दीपदान का सर्वोत्तम दिन
- माघ पूर्णिमा — अन्नदान और वस्त्रदान
- वैशाख पूर्णिमा — बुद्ध पूर्णिमा पर दान
- छठ पूजा — सूर्य की पूजा के साथ दान
- दीपावली — धनतेरस से भाई दूज तक दान का पर्व
- होली — होलिका दहन के बाद दान
- रक्षाबंधन — बहनों और भाइयों के नाम दान
- जन्माष्टमी — कृष्ण की पूजा के साथ विद्यादान
- रामनवमी — राम की पूजा के साथ अन्नदान
- गुरु पूर्णिमा — गुरु के नाम पर विद्यादान
- मकर संक्रांति — तिल-गुड़ का दान
- शनि अमावस्या — तिलदान का विशेष दिन
शुभ मुहूर्त: दान के लिए प्रातःकाल 6 से 10 बजे का समय श्रेष्ठ है। ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1 घंटा 36 मिनट पहले) सर्वोत्तम है। दोपहर बाद दान वर्जित माना जाता है। रात्रि में दान नहीं करना चाहिए।
किसे दें, क्या न दें — पात्र और अपात्र
पात्र (जिन्हें दान करें):
- शुद्ध आचरण वाले ब्राह्मण — सर्वोत्तम पात्र
- गरीब और निर्धन — सदैव पात्र
- अनाथ बच्चे — विशेष पुण्य
- विद्यार्थी — विद्यादान के लिए
- रोगी — औषधिदान के लिए
- वृद्ध और विकलांग — सेवा का अधिकारी
- तीर्थयात्री — अन्न-जल का पात्र
- साधु-संन्यासी — आध्यात्मिक पात्र
अपात्र (जिन्हें दान न करें):
- क्रोधी, स्वार्थी और दुराचारी को
- जुआरी, मद्यप और चोर को
- झूठा और छली व्यक्ति को
- कृतघ्न और अविश्वासी को
- अपने शत्रु या द्वेषी को
- बिना पूछे किसी को
क्या न दें:
- अपमान से या घृणा से दान न दें
- लोभ या दिखावे के लिए दान न करें
- पुरानी, टूटी-फूटी वस्तु दान न करें
- किसी के सामने दान देकर अपमान न करें
- अनिच्छा से या मन में असंतोष रखकर दान न दें
- कर्ज लेकर दान न करें (जरूरतमंद स्थिति को छोड़कर)
दान के मंत्र — 6 प्रभावी मंत्र
दान के समय मंत्रों का उच्चारण दान की शक्ति को अनेक गुना बढ़ा देता है:
1. "इदं न मम" मंत्र (सामान्य दान मंत्र):
इदं न मम, ईश्वराय समर्पितम्। यत् दीयते तत् पुण्यं, सर्वसिद्धिं ददातु मे॥ अर्थात् — "यह मेरा नहीं है, ईश्वर को समर्पित है। जो दान दिया जाता है वह पुण्य सब सिद्धियाँ दे।"
2. "ॐ ह्रीं श्रीं" मंत्र (शुभ दान मंत्र):
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सौः दानाय नमः। दातारं सततं रक्ष, पात्रं तृप्तिं वहातु मे॥ अर्थात् — "ॐ ह्रीं श्रीं — दान के लिए नमन। दाता की रक्षा हो, पात्र तृप्त हो।"
3. अन्नदान मंत्र:
ॐ अन्नपूर्णायै नमः, इदं अन्नं मया दत्तं। तृप्तिं यान्तु जगत्पिता, मम पुण्यं च वर्धताम्॥ अर्थात् — "माँ अन्नपूर्णा को नमन, यह अन्न मेरे द्वारा दिया गया। जगत का पिता तृप्त हो, मेरा पुण्य बढ़े।"
4. जलदान मंत्र:
ॐ जलेश्वराय नमः, इदं जलं प्रदीयते। पिपासा शाम्यतां देवि, पितरस्तृप्तिमाप्नुयुः॥ अर्थात् — "जल के देवता को नमन, यह जल दिया जाता है। प्यास शांत हो, पितर तृप्त हों।"
5. वस्त्रदान मंत्र:
ॐ वस्त्रधारिण्यै नमः, इदं वस्त्रं शुभं मया। दीयते देवि तुभ्यं वै, शुभं कुरु सदा मम॥ अर्थात् — "वस्त्रधारिणी देवी को नमन, यह शुभ वस्त्र मेरे द्वारा दिया जाता है। शुभ करो।"
6. सर्वदान मंत्र (विशेष):
ॐ सर्वस्वहरिणे नमः, यत्किञ्चित् दीयते मया। तत्सर्वं हरिणा गृह्यतां, पुण्यं मे वर्धतां सदा॥ अर्थात् — "सब हरने वाले हरि को नमन, जो कुछ भी मेरे द्वारा दिया जाता है, वह सब हरि ग्रहण करें, मेरा पुण्य बढ़े।"
जाप संख्या: दान के समय इन मंत्रों का 11 या 21 बार जाप करें। मास की पूर्णिमा या अमावस्या को 108 बार जाप अत्यंत फलदायी माना जाता है।
दान के 8 प्रमुख लाभ
- पुण्य की प्राप्ति — दान से अक्षय पुण्य का संचय होता है
- ग्रह दोष शांति — विशिष्ट दान से कमजोर ग्रहों की पीड़ा कम होती है
- कुंडली शुद्धि — पितृ दोष, कालसर्प दोष आदि का निवारण
- आर्थिक समृद्धि — देने की भावना से धन की आवक बढ़ती है
- स्वास्थ्य लाभ — औषधिदान और जलदान से रोग मुक्ति
- संतान सुख — विद्यादान से संतान को उज्ज्वल भविष्य
- पारिवारिक सुख — दान से कलह, दरिद्रता और दुख का अंत
- मोक्ष की ओर अग्रसर — दान पुण्य जन्म-जन्मांतर साथ देता है
सावधानियां और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
5 प्रमुख सावधानियां:
- श्रद्धा अनिवार्य — बिना श्रद्धा के दान निष्फल होता है
- पात्र परीक्षा — दान से पहले पात्र की शुद्धता अवश्य देखें
- अहंकार वर्जित — दान के बाद "मैंने दिया" ऐसा अहंकार न रखें
- छुपाकर दें — दान का ढोल न पीटें, गुप्त रूप से दें
- नियमित दें — एक बार दान करके न रुकें, निरंतर करें
क्या अनपढ़ व्यक्ति को दान किया जा सकता है?
हाँ, अनपढ़ व्यक्ति को दान करने में कोई दोष नहीं है। शास्त्र कहते हैं कि जरूरतमंद ही पात्र है, पढ़ा-लिखा होना अनिवार्य नहीं। अनपढ़ गरीब, वृद्ध, विकलांग, अनाथ — सब दान के पात्र हैं। अन्न, वस्त्र, जल, औषधि सभी दान किसी को भी दिए जा सकते हैं।
क्या महिलाएं दान कर सकती हैं?
हाँ, महिलाएं भी पूर्ण रूप से दान कर सकती हैं। महाभारत में सीता जी ने अन्नदान, द्रौपदी ने वस्त्रदान, और अनेक महिलाओं ने विद्यादान किया है। मासिक धर्म के दौरान पिंडदान जैसे श्राद्ध कार्य स्थगित किए जा सकते हैं, लेकिन अन्य दान किए जा सकते हैं।
क्या रात्रि में दान किया जा सकता है?
शास्त्रों के अनुसार रात्रि में दान वर्जित माना गया है। प्रातःकाल 6 से 10 बजे तक का समय दान के लिए श्रेष्ठ है। हालांकि किसी अत्यंत जरूरतमंद को रात में भोजन या जल देना पुण्य ही है, इसे "अकाल दान" कहा जाता है।
क्या ऋण लेकर दान करना चाहिए?
सामान्यतः ऋण लेकर दान करना वर्जित है। दान अपनी क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए। हालांकि, यदि अत्यंत श्रद्धा हो और ऋण चुकाने की क्षमता हो, तो विशेष अवसरों पर दान किया जा सकता है। शास्त्र कहते हैं — "ऋणं कृत्वा गृहीतं दानं पातकं" अर्थात् ऋण लेकर किया गया दान पाप होता है।
क्या वस्तु खरीदकर दान करना चाहिए?
हाँ, वस्तु खरीदकर दान करना पूर्णतः शुभ है। कई बार जरूरतमंद को सीधे वस्तु देना संभव नहीं होता, ऐसे में बाजार से अन्न, वस्त्र, कंबल, दवा आदि खरीदकर दान करना चाहिए। खरीदी हुई वस्तु दान करने से किसी प्रकार का दोष नहीं लगता।
क्या हिन्दू से अलग धर्म के व्यक्ति को दान किया जा सकता है?
शास्त्रों के अनुसार दान मानवता के लिए है, धर्म विशेष के लिए नहीं। किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति को दान किया जा सकता है — चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या वर्ग का हो। हालांकि, ब्राह्मण दान जैसे विशेष दान के लिए हिन्दू ब्राह्मण ही पात्र हैं।
शुभकामनाएँ सहित, गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली 📞 संपर्क: www.panditnmshrimali.com
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