Maa Baglamukhi 2026 - साधना का रहस्य by Nidhi Shrimali
Maa Baglamukhi 2026

Published on: April 23, 2026

मां बगलामुखी, जिन्हें पीताम्बरा और ब्रह्मास्त्र विद्या के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म की दस महाविद्याओं में आठवीं देवी हैं. तंत्र शास्त्र में …
हिंदू आध्यात्मिक परंपरा में वर्णित दस महाविद्याएं केवल देवी स्वरूप नहीं, बल्कि दिव्य चेतना के दस अत्यंत गूढ़ आयाम हैं। इन्हीं में आठवीं महाविद्या हैं मां बगलामुखी—एक ऐसी शक्ति, जिनकी साधना साधक के जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकती है।
तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया।

मंगलयुक्त चतुर्दशी की अर्धरात्रि में देवी शक्ति का देवी बगलामुखी के रूप में प्रादुर्भाव हुआ था। त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रुक सका। देवी बगलामुखी को वीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं। इनके शिव को महारुद्र कहा जाता है। इसीलिए देवी सिद्ध विद्या हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं। गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं। Maa Baglamukhi 2026

गुरु मां निधि श्रीमाली जी के अनुसार, मां बगलामुखी वह दिव्य शक्ति हैं जो नकारात्मक ऊर्जा, शत्रु बाधा और विपरीत परिस्थितियों को “स्तंभित” कर देती हैं। वे केवल बाहरी शत्रुओं पर विजय नहीं दिलातीं, बल्कि साधक के भीतर चल रहे भय, भ्रम और अशांति को भी नियंत्रित करती हैं। इसलिए उन्हें ‘स्तंभन शक्ति’ की अधिष्ठात्री कहा गया है।

गुरु मां के बताए अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व है, क्योंकि इसी दिन मां बगलामुखी का प्राकट्य हुआ था। यह दिन साधना, उपासना और विशेष अनुष्ठानों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। जो साधक इस दिन पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ मां की आराधना करता है, उसे शीघ्र फल की प्राप्ति होती है। Maa Baglamukhi 2026

गुरु मां निधि श्रीमाली जी समझाती हैं कि मां बगलामुखी को ‘पीताम्बरा’ कहा जाता है, और इसका गहरा आध्यात्मिक रहस्य है। पीला रंग केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि वह साधक की एकाग्रता, ज्ञान और आंतरिक शक्ति को जागृत करने का माध्यम है। इसलिए साधना के समय पीले वस्त्र, पीला आसन और पीले भोग का विशेष महत्व बताया गया है।

गुरु मां के अनुभवों के अनुसार, मां बगलामुखी की साधना अत्यंत शक्तिशाली होती है, लेकिन इसे करने के लिए शुद्धता, अनुशासन और सही मार्गदर्शन अनिवार्य है। यह साधना साधक को न केवल सुरक्षा प्रदान करती है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में स्थिरता, आत्मविश्वास और सफलता का मार्ग भी प्रशस्त करती है।

अंततः, गुरु मां निधि श्रीमाली जी के अनुसार, यदि सच्चे मन, पूर्ण विश्वास और उचित विधि से मां बगलामुखी की उपासना की जाए, तो साधक के जीवन में कोई भी बाधा अधिक समय तक टिक नहीं सकती।

मां बगलामुखी की कृपा आप सभी पर बनी रहे—इसी शुभकामना के साथ। Maa Baglamukhi 2026

गुरु मां निधि श्रीमाली जी के अनुसार, साधना में केवल मंत्र और ध्यान ही नहीं, बल्कि कुछ विशेष दिव्य साधन (Spiritual Tools) भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये साधन साधक की ऊर्जा को स्थिर करने और साधना के प्रभाव को कई गुना बढ़ाने में सहायक होते हैं।

इसी संदर्भ में मां बगलामुखी से संबंधित विशेष पेंडेंट और यंत्र का भी उल्लेख किया गया है। गुरु मां के अनुसार, यदि किसी साधक के पास पूर्ण विधि से साधना करने का समय या अवसर न हो, तो वह इन दिव्य साधनों के माध्यम से भी मां की ऊर्जा से जुड़ सकता है।

मां बगलामुखी का पेंडेंट धारण करने से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक ऊर्जा कवच (Protection Aura) निर्मित होता है, जो नकारात्मक शक्तियों और शत्रु बाधाओं को दूर रखने में सहायक माना जाता है। वहीं, बगलामुखी यंत्र को अपने पूजा स्थल या कार्यस्थल पर स्थापित करने से वातावरण में स्थिरता, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

गुरु मां निधि श्रीमाली जी के अनुभव के अनुसार, जब इन साधनों को श्रद्धा और विश्वास के साथ धारण या स्थापित किया जाता है, तो यह साधक के जीवन में अद्भुत परिवर्तन लाने में सक्षम होते हैं।

यदि आप मां बगलामुखी की कृपा को अपने जीवन में अनुभव करना चाहते हैं, तो इन दिव्य पेंडेंट और यंत्र को अपने साधना पथ का हिस्सा अवश्य बनाएं। (यह लेख गुरुमा निधि श्रीमाली के ज्ञान, अनुभव और उनके बताए गए आध्यात्मिक सिद्धांतों के अनुसार प्रस्तुत किया गया है।)

अथ वक्ष्यामि देवेशि बगलोत्पत्तिकारणम्‌। पुरा कृतयुगे देवि वातक्षोभ उपस्थिते॥
चराऽचरविनाशाय विष्णुश्चिन्तापरायणः। तपस्यया च सन्तुष्टा महात्रिपुरसुन्दरी॥
हरिद्राख्यं सरो दृष्ट्वा जलक्रीडापरायणा। महापीतहृदस्याऽन्ते सौराष्ट्रे बगलाम्बिका॥
श्रीविद्यासम्भवं तेजो विजृम्भति इतस्ततः। चतुर्दशी भौमयुता मकारेण समन्विता॥
कुल-ऋृक्ष-समायुक्ता वीररात्रिः प्रकीर्तिता। तस्यामेवाऽर्ध्दरात्रौ वा पीतह्रदनिवासिना॥
ब्रह्मास्त्रविद्या सञ्जाता त्रैलोक्यस्तम्भनी परा। तत्तेजो विष्णुजं तेजो विद्याऽनुविद्ययोर्गतम्‌‌॥

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफल हेतुर्भः मा सङ्गऽस्तवर्कमणि।
इस पावन कार्य में मुझे मेरी पूज्य गुरु माँ निधि श्रीमाली जी की कृपा, मार्गदर्शन एवं प्रेरणा निरंतर प्राप्त होती रही है। उनके आशीर्वाद के बिना यह कार्य संभव नहीं था। मैं उनके चरणों में हृदय से कृतज्ञता अर्पित करता हूँ।
नलखेड़ा निश्चय ही एक प्राचीन धार्मिक नगर रहा होगा, किन्तु यह विचारणीय है कि इतिहासकारों एवं धार्मिक चिंतकों का ध्यान इस ओर पर्याप्त रूप से क्यों नहीं गया—यही इस पुस्तक का मुख्य विषय है।
भवनों एवं मूर्तियों का प्रारूप (डिज़ाइन) और निर्माण का रहस्य प्राचीन विज्ञान, कला और वास्तुशिल्प में निहित है। वास्तुशास्त्र का मूल आधार वेदों में वर्णित है, विशेषतः अथर्ववेद में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। वर्तमान समय में यह अत्यंत दुःखद है कि वास्तु पद्धति को दरकिनार कर भव्य मंदिरों का निर्माण किया जा रहा है।
माँ बगलामुखी देवी का मंदिर भारत के महत्वपूर्ण देवी मंदिरों में से एक है। विषयवस्तु को ध्यान में रखते हुए मैंने माँ बगलामुखी देवी की साधना एवं नलखेड़ा के महत्व पर अपने श्रद्धापूर्ण विचार प्रस्तुत किए हैं।
आइए, हम इतिहास, ज्योतिषशास्त्र, धर्मशास्त्र और वास्तुशास्त्र के दर्पण में यह देखने का प्रयास करें कि माँ बगलामुखी देवी के मंदिर तथा नलखेड़ा नगर का निर्माण किस काल में हुआ होगा।
माँ बगलामुखी देवी मंदिर की प्राचीनता की खोज में मेरी विशेष रुचि रही, और इसी उद्देश्य से मैं प्रमुख तीर्थ स्थलों पर निर्मित मंदिरों की मूर्तिकला के दर्शन करने पहुँचा।
मंदिर की प्राचीनता को समझने के लिए, हमारी पूज्य गुरु माँ निधि श्रीमाली जी के अनुभवानुसार हमें महाभारत कालीन इतिहास के दर्पण में अवलोकन करना आवश्यक है। गुरु माँ के अनुसार, प्रबुद्ध पाठकों को यह जानना चाहिए कि इतिहासकार महाभारत युद्ध को ईसा से लगभग 3000 वर्ष पूर्व का मानते हैं।
गुरु माँ के ज्ञानानुसार, इस युद्ध का उल्लेख पाणिनि के व्याकरण में मिलने के कारण विद्वान इसकी अवधि 2000–3000 ईसा पूर्व के बीच मानते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एम. जी. रानाडे तथा आर. जी. भंडारकर जैसे विद्वान इस मत से सहमत रहे हैं, जबकि चिन्तामणि राव वैद्य एवं राजाराम शास्त्री महाभारत के काल को लगभग 5000 वर्ष प्राचीन मानते हैं।
गुरु माँ के मतानुसार, इन सभी विचारों पर गंभीर चिंतन करने से मंदिर की प्राचीनता के सत्य के अधिक निकट पहुँचा जा सकता है।
गुरु माँ निधि श्रीमाली जी के आध्यात्मिक अनुभवों के अनुसार, धर्मग्रंथों में यह स्पष्ट वर्णित है कि जब भी देवता, ऋषि या स्वयं भगवान किसी संकट में पड़े, उन्होंने शक्ति की शरण लेकर अपने कष्टों से मुक्ति पाई। रामायण में भी वर्णित है कि जब भगवान राम रावण की विशाल शक्ति के सामने युद्ध में असमंजस में थे, तब उन्होंने शक्ति की आराधना की और उसी के आशीर्वाद से विजय प्राप्त की।
गुरु माँ के अनुसार, इसी प्रकार जब पाण्डव अपना राजपाट और वैभव खो चुके, तब वे भगवान कृष्ण की शरण में गए। भगवान कृष्ण ने उन्हें माँ बगलामुखी देवी की आराधना करने का निर्देश दिया, जो शत्रुओं का नाश करने वाली और विजय प्रदान करने वाली आदिशक्ति मानी जाती हैं।

गुरु माँ के दिव्य ज्ञानानुसार, जब सृष्टि में भयंकर प्रलय का समय आया, तब स्वयं भगवान विष्णु भी उसे रोकने में असमर्थ हो गए। तब उन्होंने भगवती की शरण ली। भगवती ने उन्हें माँ बगलामुखी की आराधना करने का निर्देश दिया।
गुरु माँ के अनुभवानुसार, भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र के हरिद्रा नामक स्थान पर माँ बगलामुखी की तपस्या की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर माँ बगलामुखी ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी करुणा से प्रलय को स्तम्भित कर दिया।
इसी आधार पर गुरु माँ निधि श्रीमाली जी बताती हैं कि भगवान कृष्ण ने पाण्डवों को कष्टों से मुक्ति और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए माँ बगलामुखी देवी की साधना का मार्ग बताया। पाण्डवों ने गुरु आज्ञा को स्वीकार करते हुए ऐसे स्थान की खोज की, जहाँ दिव्य शांति और साधना की सिद्धि प्राप्त हो सके।

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