Karma and Reincarnation: जानिए अपने पूर्वजन्म और अगले जन्म के गूढ़ रहस्य
गुरु माँ निधि जी श्रीमाली के अनुसार, कर्म और पुनर्जन्म (Karma and Reincarnation) का आपस में गहरा संबंध होता है। हर आत्मा को अपने कर्मों का फल भोगना होता है और यही कारण है कि मृत्यु के पश्चात जीवात्मा को एक नया शरीर धारण करना पड़ता है, जिसे पुनर्जन्म कहा जाता है।
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र पहनता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण करती है। आत्मा अमर है, केवल शरीर नष्ट होता है।
पुनर्जन्म का उद्देश्य
पुराणों के अनुसार, मनुष्य को पाप और पुण्य दोनों के फल भोगने के लिए पुनर्जन्म लेना पड़ता है। Karma and Reincarnation की प्रक्रिया को भगवान विष्णु के दशावतारों के माध्यम से भी समझाया गया है। महर्षि पराशर ने दशावतारों को नौ ग्रहों से जोड़ा है:
सूर्य से राम
चंद्रमा से कृष्ण
मंगल से नरसिंह
बुध से भगवान बुद्ध
गुरु से वामन
शुक्र से परशुराम
शनि से कूर्म
राहु से वराह
केतु से मत्स्य
भगवान बुद्ध को अपने 5000 पूर्व जन्मों की स्मृति थी। इससे यह सिद्ध होता है कि पुनर्जन्म केवल एक विश्वास नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सत्य है।
ज्योतिष में पुनर्जन्म का संकेत
भारतीय ज्योतिष विज्ञान के अनुसार, Karma and Reincarnation को जन्मकुंडली के पंचम भाव (5th house) से जाना जा सकता है:
1. पंचम भाव और उसका स्वामी
पंचम भाव का स्वामी और उसमें स्थित राशि हमें बताती है कि व्यक्ति का पूर्वजन्म कैसा था।
सूर्य और चंद्रमा में जो बलवान ग्रह हो, वह पूर्व लोक का संकेत देता है।
2. पूर्वजन्म का लोक
सूर्य – मृत्यु लोक
चंद्रमा – पितृलोक
मंगल – पृथ्वीलोक
बुध – नरक
गुरु – देवलोक
शुक्र – पितृलोक
शनि – नरक
3. पूर्वजन्म का निवास स्थान
पंचमेश ग्रह के अनुसार:
सूर्य – पर्वतीय प्रदेश
चंद्रमा – नदियों के समीप
मंगल – कींकट प्रदेश (बिहार)
बुध – तीर्थ स्थल
गुरु – आर्यावर्त
शुक्र – सिंचित भूभाग
शनि – म्लेच्छ प्रदेश
4. पूर्वजन्म की दिशा
मेष, सिंह, धनु – पूर्व दिशा
वृषभ, कन्या, मकर – दक्षिण दिशा
मिथुन, तुला, कुंभ – पश्चिम दिशा
कर्क, वृश्चिक, मीन – उत्तर दिशा
5. पूर्वजन्म की जाति
सूर्य – क्षत्रिय
चंद्रमा – वैश्य
मंगल – क्षत्रिय
बुध – शूद्र
गुरु – ब्राह्मण
शुक्र – ब्राह्मण
शनि – म्लेच्छ
पुण्य चक्र और अगला जन्म
मृत्यु के समय बनने वाली कुंडली को "पुण्य चक्र" कहा जाता है। गुरु माँ निधि जी श्रीमाली के अनुसार, मृत्यु के 13 दिन बाद जातक के अगले जन्म का अनुमान लगाया जा सकता है।
मृत्यु के समय ग्रहों की स्थिति:
लग्न में गुरु – देवलोक की प्राप्ति
सूर्य या मंगल – मृत्युलोक
चंद्रमा या शुक्र – पितृलोक
बुध या शनि – नरक लोक
यदि द्वादश भाव में शुभ ग्रह हो, और द्वादशेश शुभ दृष्ट हो, तो मोक्ष की संभावना होती है। लेकिन यदि द्वादश भाव में शनि, राहु, केतु और अष्टमेश की युति हो, तो नरक प्राप्ति निश्चित मानी जाती है।
पूर्वजन्म के जीवन का संकेत
लग्न में उच्च का चंद्रमा – सद्विवेकी व्यापारी
लग्न में गुरु – वेदपाठी ब्राह्मण
गुरु उच्च होकर लग्न को देखे – तपस्वी या साधु
सूर्य 6, 8 या 12वें भाव में – पापी और भ्रष्ट
शुक्र लग्न/सप्तम भाव में – राजा या भोगी सेठ
शनि लग्न/चतुर्थ/सप्तम/एकादश में – निम्नवर्गीय
राहु लग्न/सप्तम में – असामान्य मृत्यु
चार या अधिक ग्रह नीच राशि के – आत्महत्या
लग्न में बुध – पारिवारिक क्लेशों से ग्रसित व्यापारी
6, 7 या 10वें भाव का मंगल – अत्यंत क्रोधी
बृहस्पति पंचम/नवम में – वीतरागी
एकादश में सूर्य, पंचम में गुरु, द्वादश में शुक्र – धर्मात्मा व दानी
निष्कर्ष
Karma and Reincarnation केवल धार्मिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह आत्मा की यात्रा को समझने का एक माध्यम है। हमारे कर्म ही तय करते हैं कि अगला जन्म कैसा होगा, किस लोक में होगा, और कौन-सी योनि में होगा। भारतीय ज्योतिष इस रहस्य को उजागर करने में अद्भुत भूमिका निभाता है।
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